भ्रष्टाचार
भ्रष्टाचार बहुत बढ़ गया,
भ्रष्टाचारी बस गई हमारे खून में ।
हर जगह भ्रष्टाचार है,
लखनऊ दिल्ली देहरादून में ।
भ्रष्टाचारी भ्रष्टाचार कर रहे,
तेल चीनी आटा दाल परचून में ।
जड़ें ऊपर हैं भ्रष्टाचार की
सारे भ्रष्टाचारी सुकून में ।
भ्रष्टाचार की जड़ें कौन उखाड़े ,
भ्रष्टाचार की जड़ें नहीं जमीन में ।
कोई जगह नहीं बची भ्रष्टाचार से,
भ्रष्टाचार नहीं भला किस कमीन में ।
भ्रष्टाचार का जो खत्मा कर दे,
वह ताकत नहीं किसी वैक्सीन में।
– सुशील चौहान
साहित्यकार/पत्रकार
जसपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखण्ड
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